हरियाणा की बोली/भाषा, साहित्य एवं संस्कृति (Haryana – Dialect/Language, Literature & Culture) - GK247
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हरियाणा की बोली/भाषा, साहित्य एवं संस्कृति
हरियाणवी संस्कृति समृद्ध संस्कृति है, जिसका पूरे भारत देश के साथ-साथ विदेशों में भी डंका है। हरियाणा का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में एक ऐसे प्रदेश की छवि उभर आती है जिसकी पुरातन धरोहर अत्यंत समृद्ध है और वर्तमान में भी जो देश के सर्वाधिक समृद्ध राज्यों में से एक है। वैदिक भूमि हरियाणा भारतीय सभ्यता का पालना रही है। भारतीय परम्पराओं में इस क्षेत्र को सृश्टि की आधात्री की मान्यता दी जाती है, जहां ब्रह्मा ने प्रथम यज्ञ करके सृष्टि का सृजन किया था। सृजन के इस सिद्धांत की पुष्टि पुरातत्वविद गाय ई.पिलग्रिम की पुरातात्विक खोज में भी होती है जिसके अनुसार डेढ़ करोड़ साल पहले मनुष्य हरियाणा की शिवालिक की पहाड़ियों में रहता था। वामनपुराण के अनुसार राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र की पावन भूमि में सात कोस क्षेत्र में भगवान शिव के वाहन नंदी को सोने के धार-फार से युक्त हल में जोतकर कृषि युग की शुरुआत की थी।
हरियाणा के नाम की उत्पत्ति के संबंध में बहुत सी व्याख्याएं हैं। हरियाणा एक प्राचीन नाम है। पुरातन काल में इस भू-भाग को ब्रह्मवर्त, आर्यवर्त और ब्रह्मोप्देष के नाम से जाना जाता था। ये नाम हरियाणा की इस धरा पर भगवान ब्रह्मा के अवतरण; आर्यों का निवास स्थान और वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर आधारित हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह क्षेत्र सृजन की भूमि है और इस धरा पर स्वर्ग के समान है। इसके अन्य नाम बहुधान्यक व हरियानक इस क्षेत्र में खाद्यान्नों और वनस्पति की प्रचुरता के परिचायक हैं।’ जिला रोहतक के बोहर गांव से मिले शिलालेख के अनुसार इस क्षेत्र को हरियानक के नाम से जाना जाता था। यह शिलालेख विक्रमी सम्वत् 1337 के दौरान बलबन काल से सम्बन्धित है। सुल्तान मोहम्मद-बिन-तुगलक के शासनकाल के एक पत्थर पर ‘हरियाणा’ शब्द अंकित है। धरणीधर ने अपनी रचना अखण्ड प्रकाश में लिखा है कि ‘यह शब्द ‘हरिबंका’ से लिया गया है, जो भगवान हरि की पूजा भगवान इंद्र से जुड़ा है। एक अन्य विचारक, गिरीश चंदर अवस्थी इसकी उत्पत्ति ऋग्वेद से मानते हैं, जिसमें हरियाणा नाम को राजा (वासुराजा) के नाम के साथ सार्वनामिक विशेषण के रूप में प्रयोग किया गया है। उनका मत है कि इस क्षेत्र पर उस राजा ने शासन किया था और इस तरह से इस क्षेत्र का नाम हरियाणा उनके नाम पर पड़ गया।
हरियाणा का गौरवपूर्ण अतीत अनेक मिथकों, किवदंतियों और वैदिक संदर्भों से भरा हुआ है। महर्षि वेदव्यास ने इसी पावन धरा पर महाभारत काव्य की रचना की। पांच हजार साल पहले यहीं पर महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का दिव्य संदेश देकर कर्तव्यबोध कराया था। उन्होंने कहा था कि ‘हे मनुष्य तू कर्म कर, फल की चिंता मत कर’ तभी से कर्म का यह दर्शन मानवमात्र का प्रकाश स्तंभ की तरह हर समय मार्गदर्शन कर रहा है।
महाभारत काल से ही हरियाणा बहुधान्यक व बहुधना प्रदेश के रूप में विख्यात है। महाभारत के युद्ध से पहले भी कुरुक्षेत्र में दस राजाओं की लड़ाई हुई थी लेकिन महाभारत का युद्ध धर्म की स्थापना के लिए लड़ा गया था। इसमें भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का पावन संदेश दिया था, जिससे कुरुक्षेत्र पूरे विश्व में विख्यात हो गया।
हरियाणा क्षेत्र अनेक युद्धों का साक्षी रहा है क्योंकि यह उत्तर भारत का प्रवेश द्वार है। हूणों, तुर्कों और तुगलकों ने अनेक बार भारत पर आक्रमण किया और हरियाणा की भूमि पर निर्णायक लड़ाइयां लड़ी गईं। 14वीं शताब्दी के अंत में तैमूरलंग ने इसी क्षेत्र से दिल्ली में प्रवेश किया था। 1526 में मुगलों ने पानीपत की ऐतिहासिक भूमि पर इब्राहिम लोधी को पराजित किया। पानीपत में ही 1556 में एक ओर निर्णायक युद्ध लड़ा गया, जिसने सदियों तक मुगलों को अपराजित शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। 18वीं शताब्दी के मध्य में मराठाओं ने हरियाणा पर अपना शासन स्थापित किया। भारत में अहमदशाह दुर्रानी के आक्रमण, मराठा शक्ति के उत्थान और मुगलों के पतन के बाद अंततः अंग्रेजी शासन का आगमन हुआ।
वास्तव में हरियाणा का इतिहास साहसी, धर्मनिश्ठ और गौरवशाली लोगों के संघर्ष की गाथा है। प्राचीनकाल से ही हरियाणा के बहादुर लोगों ने बड़े साहस के साथ विदेशी आक्रमणकारियों की सेनाओं का डटकर मुकाबला किया। इन तमाम झंझावातों का सामना करते हुए भी हरियाणा के लोग अपनी गरिमामयी परम्पराओं और इस पावन भूमि के गौरव को बनाए हुए हैं। 1857 में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यहां के वीरों ने शहादत, त्याग और वीरता का नया इतिहास रचा, जो इस कर्मभूमि की विषेशता को दर्शाता है। हरियाणा के वीरों ने सदैव ही राष्ट्रविरोधी शक्तियों का डटकर मुकाबला किया है।
हरियाणा का समाज सदैव विभिन्न जातियों, संस्कृतियों और धर्मों का मिश्रण रहा है। इस भूमि पर ये सब मिले, आपस में एक-दूसरे से जुड़े और एक सच्चे भारतीय बनकर निखरे। यहीं पर हिन्दू संतों और सिख गुरुओं ने विश्व प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया। महाकवि सूरदास का जन्म हरियाणा के जिला फरीदाबाद में स्थित गांव सीही में हुआ था, जो भारतीय संस्कृति का एक और केन्द्र है। भगवान श्री कृष्ण की कथा हरियाणा के हर आदमी की जुबान पर है। पशुओं के प्रति प्रेम और आहार में दूध की प्रचुरता के कारण इसे दूध-दही की नदियों वाले प्रदेश के रूप में विश्वव्यापी प्रसिद्धि मिली।
भारतीय गणराज्य के एक अलग प्रदेश के रूप में हरियाणा की स्थापना 1 नवम्बर, 1966 को हुई। देश के भौगोलिक क्षेत्र का 1.37 प्रतिशत और जनसंख्या का दो प्रतिशत होने के बावजूद हरियाणा ने विभिन्न क्षेत्रों में शानदार उपलब्धियां प्राप्त की हैं जो अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय हैं। हरियाणा विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से विकास करते हुए अग्रणी राज्य बन गया है। हरियाणा आज दूध व खाद्यान्न उत्पादन में अव्वल है। यह आटोमोबाइल, आईटी और अन्य उद्योगों का बड़ा केन्द्र है। यहां अति उत्तम संचार सुविधाओं, विकसित औद्योगिक संपदाओं, चमचमाते चौड़े राजमार्ग, एक्सप्रेस वे, रेलमार्ग, मैट्रो रेल का जाल बिछ चुका है। उन पर बने अनेक ओवर ब्रिज व फ्लाईओवर यातायात को सुगम बना रहे हैं। राज्य का हर गांव बिजली की रोशनी से जगमगा रहा है और आने-जाने के लिए सड़कों से जुड़ा है। यही नहीं पेयजल और सिंचाई के लिए पर्याप्त नहरें व अन्य साधन प्रदेश में उपलब्ध हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी यहां आधुनिक शिक्षा के हर संकाय और विषय की शिक्षा देने के लिए अनेक विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान खुल चुके हैं।
हरियाणवीं सांग, रागनी, हरियाणवी वेशभूषा, हरियाणवीं हास्य व्यंग्य और खान-पान इस संस्कृति के विशेष अंग है। हरियाणा को एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर गर्व है जो वैदिक काल में वापस जाता है। राज्य लोकगीत में समृद्ध है। हरियाणा के लोगों की अपनी परंपराएं हैं। ध्यान, योग और वैदिक मंत्रों का जप करने की उम्र के पुराने रीति-रिवाजों को अभी भी जनता द्वारा देखा जाता है। मौसमी और धार्मिक त्यौहार इस क्षेत्र की संस्कृति की महिमा करते हैं।
- हरियाणा के कुछ प्रमुख नृत्य : धमाल नृत्य, मंजीरा नृत्य, लूर नृत्य, डमरू, छठी नृत्य इत्यादि।
- हरियाणा के कुछ प्रमुख त्यौहार : तीज, फाग, सलोमण (रक्षा बंधन), संक्रात (मकर सक्रांति), गूगा इत्यादि।
- हरियाणा का पहनावा : ओढणा, छ्यामा, पीलिया, चुंदड़ी, डिमाच, दामण इत्यादि।
हरियाणवी भाषा या बोली
हरियाणवी भाषा को एक सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भाषा के रूप में सराहा गया है। यह भाषा, भाषा न होकर एक बोली है जो इंडो आर्यन परिवार से ताल्लुक रखती हैं। वैसे तो हरियाणवी में कई लहजे हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों के अनुसार बदल जाती है। उत्तर हरियाणा में बोली जाने वाली हरियाणवी थोड़ा सरल होती है तथा हिन्दी भाषी व्यक्ति इसे थोड़ा बहुत समझ सकते हैं। दक्षिण हरियाणा में बोली जाने वाली बोली को ठेठ हरियाणवी कहा जाता है। यह कई बार उत्तर हरियाणा वालों को भी समझ में नहीं आती ।
इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में हरियाणवी भाषा समूह के कई रूप प्रचलित हैं जैसे: बाँगर, राँघड़ी आदि।
राजस्थान से सटे जिले – महेंद्रगढ़ और रेवाड़ी जिलों में अहिरवती, भिवानी, सिरसा और हिसार जिलों में बागड़ी, मेवात जिले में मेवाती और फरीदाबाद और गुड़गांव जिले में ब्रजभाषा बोलते हैं।
जींद और कैथल जिले में बांगरू बोली जाती है। कैथल, जींद, हिसार (नारनौल, उकलाना, हाँसी की तरफ), असंध, गोहाना में बोली जाने वाली हरियाणवी- बोली को हरियाणवी के मानक और वास्तविक रूप के तौर पर जाना जाता है जो सोनीपत, झज्जर आदि में बोली जाने वाली हरयाणवी से अलग है।
- हरियाणवी भाषा का विकास – शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
- हरियाणवी भाषा पश्चमी हिंदी की उपभाषा है।
- हरियाणवी में मुख्य तौर पर छह बोलियाँ है।
- हरियाणवी में बांगरु भाषा का नामकरण किया है – डॉ० ग्रियर्सन ने।
- देशी बोली किसे कहा जाता है – बांगरू को।
- अहीरवाटी क्षेत्र को “हिरी” के नाम से भी जाना जाता है।
- सूरदास – ब्रज के प्रसिद्ध हरियाणवी कवि हैं, इनका जन्म – वल्लभगढ के सीही गाँव में हुआ था।
- कौरवी को – मानक हिंदी के विकास में प्रमुख बोली माना गया है। इसको अम्बालवी भी कहते हैं। डॉ० कैलाशचन्द्र सिंघल ने 650 शब्दों की सूची कौरवी में सम्मलित की है।
- बागड़ क्षेत्र की बोली को – बागड़ी कहते हैं।
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